ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
नेत्रे च दक्षिणे वामे सोमं हृदि विभुं द्विजाः आजानु पृथिवीतत्त्वम् आनाभेर् वारिमण्डलम्
netre ca dakṣiṇe vāme somaṃ hṛdi vibhuṃ dvijāḥ ājānu pṛthivītattvam ānābher vārimaṇḍalam
दाएँ और बाएँ नेत्रों में सोम को स्थापित करो, और हृदय में सर्वव्यापी प्रभु का ध्यान करो। नाभि से घुटनों तक पृथ्वी-तत्त्व, और नाभि-प्रदेश में जल-मण्डल का भाव करो।
Suta Goswami (narrating a Shaiva nyasa/dhyana instruction within the Linga Purana discourse)