ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
षट्प्रकारं समभ्यस्य चतुःषड्दशभिस् तथा तथा द्वादशधा चैव पुनः षोडशधा क्रमात्
ṣaṭprakāraṃ samabhyasya catuḥṣaḍdaśabhis tathā tathā dvādaśadhā caiva punaḥ ṣoḍaśadhā kramāt
छः प्रकार की उपासना का भलीभाँति अभ्यास करके, फिर चौबीस प्रकारों में भी उसी प्रकार करे। इसी तरह बारह विभागों में, और उसके बाद क्रम से सोलह विभागों में भी साधना करे।
Suta Goswami