ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
ज्ञानं गुरोर्हि संपर्कान् न वाचा परमार्थतः चतुर्व्यूहमिति ज्ञात्वा ध्याता ध्यानं समभ्यसेत्
jñānaṃ gurorhi saṃparkān na vācā paramārthataḥ caturvyūhamiti jñātvā dhyātā dhyānaṃ samabhyaset
परमार्थतः ज्ञान गुरु के सान्निध्य-संपर्क से प्राप्त होता है, केवल वाणी से नहीं। अतः चतुर्व्यूह-तत्त्व को जानकर ध्याता को निरंतर ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।
Suta Goswami (narrating the teaching tradition to the sages at Naimisharanya)