ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
तस्मात्सदाभ्यसेज्ज्ञानं तन्निष्ठस्तत्परायणः ज्ञानेनैकेन तृप्तस्य त्यक्तसंगस्य योगिनः
tasmātsadābhyasejjñānaṃ tanniṣṭhastatparāyaṇaḥ jñānenaikena tṛptasya tyaktasaṃgasya yoginaḥ
अतः सदा मुक्तिदायक ज्ञान का अभ्यास करे, उसी में निष्ठा रखे और उसी को अपना एकमात्र आश्रय माने। जो योगी केवल ज्ञान से तृप्त है और संग-आसक्ति त्याग चुका है, उसके लिए वही ज्ञान पाश-बन्धन से विमुक्ति और पति—भगवान् शिव—की ओर दृढ़ प्रवृत्ति का प्रत्यक्ष साधन बनता है।
Suta Goswami (narrating Shaiva doctrine to the sages of Naimisharanya, summarizing the yogin’s discipline)