ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
प्रसन्नं च यदेकाग्रं तदा ज्ञानमिति स्मृतम् अज्ञानमितरत्सर्वं नात्र कार्या विचारणा
prasannaṃ ca yadekāgraṃ tadā jñānamiti smṛtam ajñānamitaratsarvaṃ nātra kāryā vicāraṇā
जब मन प्रसन्न और एकाग्र हो जाता है, वही अवस्था ‘ज्ञान’ कही गई है। इसके अतिरिक्त सब कुछ अज्ञान है—इसमें और विचार की आवश्यकता नहीं।
Suta Goswami (narrating Shaiva teaching within the Linga Purana discourse)