उमामहेश्वरव्रतं—पञ्चाक्षरमन्त्रस्य माहात्म्यं, न्यासः, जपविधिः, सदाचारः, विनियोगः
तथा पापं विलीयेत आचार्यस्य समीपतः यथा प्रज्वलितो वह्निर् विष्ठां काष्ठं च निर्दहेत्
tathā pāpaṃ vilīyeta ācāryasya samīpataḥ yathā prajvalito vahnir viṣṭhāṃ kāṣṭhaṃ ca nirdahet
उसी प्रकार आचार्य के सान्निध्य में पाप विलीन हो जाता है; जैसे प्रज्वलित अग्नि मल और काष्ठ—दोनों को भस्म कर देती है। शिवमार्ग में गुरु की उपस्थिति ज्ञानाग्नि प्रज्वलित कर पाश को दग्ध करती है और पशु को पति—शिव—की ओर उन्मुख करती है।
Suta Goswami (narrating the teaching to the sages of Naimisharanya, within a Guru-sevā context)