अध्याय ८२ — व्यपोहनस्तवः (पापव्यपोहन-स्तोत्रम्)
एते पापं व्यपोहन्तु मनसा कर्मणा कृतम् नभस्वान्स्पर्शनो वायुर् अनिलो मारुतस् तथा
ete pāpaṃ vyapohantu manasā karmaṇā kṛtam nabhasvānsparśano vāyur anilo mārutas tathā
ये नभस्वान, स्पर्शन, वायु, अनिल और मारुत—मन और कर्म से किए हुए पाप को दूर करें। वायु-तत्त्व के पावन स्पर्श से पशु (जीव) के पाश-बन्ध ढीले हों, और अनुग्रह से अंतःप्रवाह पति शिव की ओर मुड़े।
Suta Goswami (narrating the Linga Purana to the sages of Naimisharanya)