शिवार्चनविधिः — देवतानां पाशुपतव्रतप्राप्तिः तथा पशुपाशविमोक्षणम् (अध्याय ८०)
प्रासादशृङ्गेष्वथ पौरनार्यः सहस्रशः पुष्पफलाक्षताद्यैः स्थिताः करैस्तस्य हरेः समन्तात् प्रचिक्षिपुर्मूर्ध्नि यथा भवस्य
prāsādaśṛṅgeṣvatha pauranāryaḥ sahasraśaḥ puṣpaphalākṣatādyaiḥ sthitāḥ karaistasya hareḥ samantāt pracikṣipurmūrdhni yathā bhavasya
तब प्रासादों के शिखरों पर नगर-नारियाँ सहस्रों की संख्या में खड़ी थीं; उनके हाथों में पुष्प, फल, अक्षत आदि थे। वे चारों ओर से उस हरि के मस्तक पर वैसे ही बरसाने लगीं, जैसे भवा (शिव) के मस्तक पर शुभोपहार अर्पित किए जाते हैं।
Suta Goswami (narrating to the sages of Naimisharanya)