शिवार्चनविधिः — देवतानां पाशुपतव्रतप्राप्तिः तथा पशुपाशविमोक्षणम् (अध्याय ८०)
सहस्रसूर्यप्रतिमं महान्तं सहस्रशः सर्वगुणैश् च भिन्नम् जगाम कैलासगिरिं महात्मा मेरुप्रभागे पुरमादिदेवः
sahasrasūryapratimaṃ mahāntaṃ sahasraśaḥ sarvaguṇaiś ca bhinnam jagāma kailāsagiriṃ mahātmā meruprabhāge puramādidevaḥ
आदिदेव, महात्मा, कैलासगिरि को गए—मेरु के प्रभाग पर स्थित उस विशाल पुर की ओर, जो सहस्र सूर्यों के समान दीप्त था और असंख्य गुण-वैभवों से विभूषित था। यह शिवधाम पाश-विमोचक पति-शिव की परम शुभ सत्ता का प्रकाश है।
Suta Goswami (narrating to the sages of Naimisharanya)