Adhyaya 70: आदिसर्गः—महत्-अहङ्कार-तन्मात्रा-भूतसृष्टिः, ब्रह्माण्डावरणम्, प्रजासर्गः, त्रिमूर्ति-शैवाधिष्ठानम्
सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णस् त्वतीन्द्रियः ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुष्वाप सलिले तदा
sahasraśīrṣā puruṣo rukmavarṇas tvatīndriyaḥ brahmā nārāyaṇākhyastu suṣvāpa salile tadā
तब सहस्रशीर्षा, सुवर्णवर्ण और इन्द्रियों से परे वह पुरुष—जो ब्रह्मा और ‘नारायण’ नाम से प्रसिद्ध है—आदि जल में योगनिद्रा में शयन करने लगा; शैव सिद्धान्त में यह प्रकृति के भीतर आवरण-शक्ति (पाश) का संकेत है, जबकि परम पति शिव सर्वोत्पत्ति का अतीत आधार हैं।
Suta Goswami (narrating to the sages of Naimisharanya)