वंशानुवर्णनम् — सात्वतवंशः, स्यमन्तक-प्रसङ्गः, कृष्णावतारः, शिवप्रसादः (पाशुपतयोगः)
दत्त्वैनं नन्दगोपस्य रक्षतामिति चाब्रवीत् रक्षकं जगतां विष्णुं स्वेच्छया धृतविग्रहम्
dattvainaṃ nandagopasya rakṣatāmiti cābravīt rakṣakaṃ jagatāṃ viṣṇuṃ svecchayā dhṛtavigraham
उसे नन्दगोप को देकर उसने कहा, “इसे सुरक्षित रखना।” वह जगतों के रक्षक विष्णु थे, जिन्होंने अपनी स्वेच्छा से देह धारण की थी। (शैव दृष्टि में ऐसे अवतरण परम पति शिव की आज्ञा और शक्ति से ही लोक-रक्षा करते हैं।)
Suta Goswami (narrating the Purana to the sages of Naimisharanya)