ययातिना पूरौ राज्याभिषेकः, दिक्प्रदानं, तृष्णा-वैराग्योपदेशः, वनप्रवेशः च
यो ऽसौ प्राणान्तिको रोगस् तां तृष्णां त्यजतः सुखम् जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः
yo 'sau prāṇāntiko rogas tāṃ tṛṣṇāṃ tyajataḥ sukham jīryanti jīryataḥ keśā dantā jīryanti jīryataḥ
वह तृष्णा प्राणान्तक रोग है; जो उसे त्याग देता है, उसे सुख-शान्ति मिलती है। समय के साथ केश जीर्ण होते हैं; समय के साथ दाँत भी जीर्ण होते हैं—जीर्णता के साथ सब कुछ जीर्ण होता जाता है।
Suta Goswami (narrating teachings within the Purva-Bhaga context to the sages of Naimisharanya)