ययातिना पूरौ राज्याभिषेकः, दिक्प्रदानं, तृष्णा-वैराग्योपदेशः, वनप्रवेशः च
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा यदा परान्न बिभेति परे चास्मान्न बिभ्यति
karmaṇā manasā vācā brahma sampadyate tadā yadā parānna bibheti pare cāsmānna bibhyati
कर्म, मन और वाणी से तब ब्रह्म-स्थिति प्राप्त होती है, जब वह किसी से भय नहीं करता और अन्य लोग भी उससे भय नहीं करते। पाश-निवृत्ति से पति-परमेश्वर में स्थिर होकर पशु-आत्मा की यही निर्भयता शुद्धि का लक्षण है।
Suta Goswami (narrating the teaching within the Purva-Bhaga context)