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Shloka 52

देवादिसृष्टिकथनम् (वसिष्ठशोकः, पराशरजन्म, एकलिङ्गपूजा, रुद्रदर्शनम्)

पुरेषु राक्षसानां च प्रणादं विषमं द्विजाः आश्रमस्थाश् च मुनयः समूहुर्हर्षसंततिम्

pureṣu rākṣasānāṃ ca praṇādaṃ viṣamaṃ dvijāḥ āśramasthāś ca munayaḥ samūhurharṣasaṃtatim

हे द्विजो, नगरों में राक्षसों का कठोर और बेसुरा गर्जन उठा; तब आश्रमों में रहने वाले मुनि निरंतर हर्ष की धारा में एकत्र हुए, इसे शुभ संकेत मानकर कि पाश-बल को दबाने वाले पति शिव शीघ्र ही पशुओं (जीवों) की रक्षा करेंगे।

पुरेषुin the cities
पुरेषु:
राक्षसानाम्of the Rakshasas (demonic beings)
राक्षसानाम्:
and
:
प्रणादम्roar, clamour
प्रणादम्:
विषमम्uneven, harsh, irregular
विषमम्:
द्विजाःO twice-born (Brahmins)
द्विजाः:
आश्रमस्थाःresiding in hermitages
आश्रमस्थाः:
and
:
मुनयःsages
मुनयः:
समूहुःassembled, gathered
समूहुः:
हर्षसंततिम्an unbroken continuity of joy, sustained delight
हर्षसंततिम्:

Suta Goswami