युगधर्मवर्णनम् — चतुर्युग, गुण, धर्मपाद, तथा वार्तोत्पत्ति
प्रनष्टा मधुना सार्धं कल्पवृक्षाः क्वचित्क्वचित् तस्यामेवाल्पशिष्टायां सिद्ध्यां कालवशात्तदा
pranaṣṭā madhunā sārdhaṃ kalpavṛkṣāḥ kvacitkvacit tasyāmevālpaśiṣṭāyāṃ siddhyāṃ kālavaśāttadā
तब काल (समय) के वश से, मधु-सम्पदा सहित कल्पवृक्ष कहीं-कहीं लुप्त हो गए। और जो सिद्धि शेष भी रही, वह भी समय के प्रभाव से बहुत थोड़ी-सी ही रह गई।
Suta Goswami