युगधर्मवर्णनम् — चतुर्युग, गुण, धर्मपाद, तथा वार्तोत्पत्ति
वर्णाश्रमव्यवस्था च तदासीन्न च संकरः रसोल्लासः कालयोगात् त्रेताख्ये नश्यते द्विज
varṇāśramavyavasthā ca tadāsīnna ca saṃkaraḥ rasollāsaḥ kālayogāt tretākhye naśyate dvija
उस युग में वर्ण और आश्रम की व्यवस्था दृढ़ थी, और कोई संकर या भ्रम न था। परन्तु हे द्विज, काल-योग से धर्म-रस का उल्लास त्रेता नामक युग में क्षीण होकर नष्ट हो जाता है।
Suta Goswami (narrating yuga-dharma to the sages of Naimisharanya)