क्षुपस्य विष्णुदर्शनं, वैष्णवस्तोत्रं, दधीचविवादः, स्थानेश्वरतीर्थमाहात्म्यं
एवं स्मृत्वा हरिः प्राह ब्रह्मणः क्षुतसंभवम् विप्राणां नास्ति राजेन्द्र भयमेत्य महेश्वरम्
evaṃ smṛtvā hariḥ prāha brahmaṇaḥ kṣutasaṃbhavam viprāṇāṃ nāsti rājendra bhayametya maheśvaram
ऐसा स्मरण करके हरि बोले—“ब्रह्मा की क्षुधा से उत्पन्न यह भय है। राजेन्द्र, ब्राह्मणों को भय नहीं; महेश्वर की शरण जाओ।”
Suta Goswami (narrating an internal speech of Hari/Vishnu)