क्षुपस्य विष्णुदर्शनं, वैष्णवस्तोत्रं, दधीचविवादः, स्थानेश्वरतीर्थमाहात्म्यं
सप्तपातालपादस्त्वं धराजघनमेव च वासांसि सागराः सप्त दिशश्चैव महाभुजाः
saptapātālapādastvaṃ dharājaghanameva ca vāsāṃsi sāgarāḥ sapta diśaścaiva mahābhujāḥ
आपके पाद सप्त पाताल हैं; पृथ्वी का घन ही आपका शरीर है। सात सागर आपके वस्त्र हैं, और सात दिशाएँ आपकी महाबाहुएँ हैं।
Suta Goswami (narrating a hymn of praise within the Purva-Bhaga context)