एकार्णव-सृष्टिक्रमः, ब्रह्म-विष्णु-परस्परप्रवेशः, शिवस्य आगमनं च
पर्यटित्वा तु देवस्य ददृशे ऽन्तं न वै हरेः ज्ञात्वा गतिं तस्य पितामहस्य द्वाराणि सर्वाणि पिधाय विष्णुः विभुर्मनः कर्तुमियेष चाशु सुखं प्रसुप्तो ऽहमिति प्रचिन्त्य
paryaṭitvā tu devasya dadṛśe 'ntaṃ na vai hareḥ jñātvā gatiṃ tasya pitāmahasya dvārāṇi sarvāṇi pidhāya viṣṇuḥ vibhurmanaḥ kartumiyeṣa cāśu sukhaṃ prasupto 'hamiti pracintya
खोज में भटकते हुए भी हरि उस दिव्य लिङ्ग का कोई अन्त न देख सके। पितामह (ब्रह्मा) की गति जानकर सर्वव्यापी विष्णु ने बाहर की खोज के सब द्वार बन्द कर दिए और मन को स्थिर करने का निश्चय किया, यह सोचकर—“मैं सुख से विश्राम करूँ।”
Suta Goswami (narrating the Brahma–Vishnu episode to the sages of Naimisharanya)