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Shloka 45

दक्षयज्ञध्वंसः—वीरभद्रप्रेषणं, देवविष्ण्वोः पराजयः, पुनरनुग्रहः

दक्षस्य च मुनीन्द्रस्य तथान्येषां महेश्वरः वागीश्याश्चैव नासाग्रं देवमातुस्तथैव च

dakṣasya ca munīndrasya tathānyeṣāṃ maheśvaraḥ vāgīśyāścaiva nāsāgraṃ devamātustathaiva ca

महेश्वर ने दक्ष, उस मुनिवर, तथा अन्य जनों के भी नासाग्र को स्पर्श/चिह्नित किया; वैसे ही वागीशी और देवमाता के नासाग्र को भी। इस दिव्य चिह्न से प्रभु पति ने धर्मानुसार पशुओं (जीवों) को बाँधने और मुक्त करने का अपना ऐश्वर्य स्थापित किया।

दक्षस्यof Dakṣa
दक्षस्य:
and
:
मुनीन्द्रस्यof the lord of sages (a great ṛṣi)
मुनीन्द्रस्य:
तथाlikewise
तथा:
अन्येषाम्of others
अन्येषाम्:
महेश्वरःMahēśvara (Lord Śiva as supreme ruler)
महेश्वरः:
वागीश्याःof Vāgīśī (lady of speech / Sarasvatī-like figure)
वागीश्याः:
च एवand indeed
च एव:
नासाग्रम्the tip of the nose
नासाग्रम्:
देवमातुःof Devamātā (mother of the gods)
देवमातुः:
तथा एवlikewise
तथा एव:
and
:

Suta Goswami (narrating to the sages of Naimisharanya)