Steya-doṣa-nirūpaṇa (On the Nature and Gravity of Theft) — within the Hayagrīva–Agastya Saṃvāda frame
भवद्भिस्तु कृतं पापं दैवात्सुकृतमप्युत / किमिच्छथ फलं भोक्तुं दुष्कृतस्य शुभस्य वा
bhavadbhistu kṛtaṃ pāpaṃ daivātsukṛtamapyuta / kimicchatha phalaṃ bhoktuṃ duṣkṛtasya śubhasya vā
तुम लोगों ने पाप किया है और दैवयोग से कुछ पुण्य भी हुआ है। बताओ, तुम किसका फल भोगना चाहते हो—दुष्कर्म का या शुभ कर्म का?