Śrī Kāmākṣī–Mahātripurasundarī: Immanence of Śakti and Cosmic Administration
Lalitopākhyāna
सत्यमेवाधुना दृष्टा ह्यावाभ्यामपि सा परा / न स्वप्नो न भ्रमो वापि साक्षात्ते हृदयं गता / इत्युक्त्वा पार्श्वयोस्तस्या निषण्णे विनयानते
satyamevādhunā dṛṣṭā hyāvābhyāmapi sā parā / na svapno na bhramo vāpi sākṣātte hṛdayaṃ gatā / ityuktvā pārśvayostasyā niṣaṇṇe vinayānate
‘आज हमने भी निश्चय ही उस परम देवी को देखा है; यह न स्वप्न है, न कोई भ्रम—वह साक्षात् तुम्हारे हृदय में प्रविष्ट हो गई है।’ ऐसा कहकर वे दोनों उसके दोनों पार्श्वों में विनय से झुककर बैठ गईं।