ललितोपाख्याने मन्त्रतारतम्यकथनम्
Hierarchy of Mantras in the Lalitopākhyāna
न प्राप्यते कुचारित्रैः कुत्सितैः कुटिलाशयैः / दैवबाह्यैर्वृथातर्कैर्वृथा विभ्रान्त बुद्धिभिः
na prāpyate kucāritraiḥ kutsitaiḥ kuṭilāśayaiḥ / daivabāhyairvṛthātarkairvṛthā vibhrānta buddhibhiḥ
कुचरित्र, कुत्सित और कुटिल-आशय वालों से वह प्राप्त नहीं होती। जो दैव से विमुख, व्यर्थ तर्क करने वाले और भ्रमित बुद्धि वाले हैं, उन्हें भी वह व्यर्थ ही रहती है।