ललितोपाख्याने मन्त्रतारतम्यकथनम्
Hierarchy of Mantras in the Lalitopākhyāna
मुञ्चन्त्यो हृदि याचन्त्यो भवन्ति हरिणीदृशः / अरण्ये पत्तने वापि देवालयमठेषु वा / यत्र कुत्रापि तिष्ठन्तं तं धावन्ति मृगीदृशः
muñcantyo hṛdi yācantyo bhavanti hariṇīdṛśaḥ / araṇye pattane vāpi devālayamaṭheṣu vā / yatra kutrāpi tiṣṭhantaṃ taṃ dhāvanti mṛgīdṛśaḥ
हृदय का संकोच छोड़कर, विनय से याचना करती वे हरिणी-नयना बन जाती हैं—वन में, नगर में, देवालयों और मठों में भी; जहाँ कहीं वह ठहरता है, वहीं मृगी-सी दृष्टिवाली दौड़ पड़ती हैं।