दिक्पालादि-शिवलोकान्तर-कथनम्
Account of the Dikpālas and Intervening Realms toward Śiva’s Worlds
अनुलोमविलोमाभ्यां सञ्चारं वापिकाजले / तन्वाना सततं तारा कक्ष्यामेनां हि रक्षति
anulomavilomābhyāṃ sañcāraṃ vāpikājale / tanvānā satataṃ tārā kakṣyāmenāṃ hi rakṣati
वापिका के जल में अनुलोम-विलोम गति से निरन्तर विचरण करती हुई तारा, इस कक्षा (परिधि) को सदा बनाए रखकर इसकी रक्षा करती है।