दिक्पालादि-शिवलोकान्तर-कथनम्
Account of the Dikpālas and Intervening Realms toward Śiva’s Worlds
अजरामरतां प्राप्तास्तत्र विन्ध्यनिषूदन / सदाकूजितलक्षेण तत्र कारण्डवद्विजाः
ajarāmaratāṃ prāptāstatra vindhyaniṣūdana / sadākūjitalakṣeṇa tatra kāraṇḍavadvijāḥ
हे विन्ध्यनिषूदन! वहाँ वे अजर-अमरता को प्राप्त हो जाते थे। सदा कूजन के लक्षण से वहाँ कारण्डव पक्षी (द्विज) रहते थे।