दिक्पालादि-शिवलोकान्तर-कथनम्
Account of the Dikpālas and Intervening Realms toward Śiva’s Worlds
इति श्रीब्रह्माण्डमहापुराणे उत्तरभागे हयग्रीवागस्त्य संवादे ललितोपाख्याने दिक्पालादिशिवलोकान्तरकथनं ना चतुस्त्रिंशो ऽध्यायः हयग्रीव उवाच अथ वापीत्र यादीनां कक्ष्याभेदान्प्रचक्ष्महे / एषां श्रवणमात्रेण जायते श्रीमहोदयः
iti śrībrahmāṇḍamahāpurāṇe uttarabhāge hayagrīvāgastya saṃvāde lalitopākhyāne dikpālādiśivalokāntarakathanaṃ nā catustriṃśo 'dhyāyaḥ hayagrīva uvāca atha vāpītra yādīnāṃ kakṣyābhedānpracakṣmahe / eṣāṃ śravaṇamātreṇa jāyate śrīmahodayaḥ
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्डमहापुराण के उत्तरभाग में, हयग्रीव–अगस्त्य संवाद के ललितोपाख्यान में ‘दिक्पाल आदि तथा शिवलोकों के अन्तर का वर्णन’ नामक चौंतीसवाँ अध्याय है। हयग्रीव बोले—अब हम वापी आदि के प्राकार-भेद बताते हैं; इनके केवल श्रवण से ही महान् श्री-समृद्धि उत्पन्न होती है।