Amāvasyā-Pitṛtarpaṇa: Purūravas and the Soma-Based Ancestral Offering (अमावस्या-पितृतर्पण / सोमतर्पण-विधि)
प्राप्नोत्यन्नं यथादत्तं जन्तुर्यत्रावतिष्ठते / यथा गोषु प्रनष्टामु वत्सो विन्दति मातरम्
prāpnotyannaṃ yathādattaṃ janturyatrāvatiṣṭhate / yathā goṣu pranaṣṭāmu vatso vindati mātaram
जीव जहाँ-जहाँ स्थित होता है, वहाँ उसे दिया हुआ अन्न उसी प्रकार प्राप्त होता है; जैसे गौओं के बीच खोया हुआ बछड़ा भी अपनी माता को पा लेता है।