ध्रुवचर्याकीर्तनं / Dhruva-caryā-kīrtana
Account of Dhruva’s Course and Related Cosmological Ordering
एवं रश्मिसहस्रं तु सौरं लोकार्थसाधकम् / भिद्यते ऋतुमासाद्य जलशीतोष्णनिस्रवम्
evaṃ raśmisahasraṃ tu sauraṃ lokārthasādhakam / bhidyate ṛtumāsādya jalaśītoṣṇanisravam
इस प्रकार लोक-कल्याण साधने वाला सूर्य का सहस्र-रश्मि-समूह ऋतु को प्राप्त होकर विभक्त हो जाता है और जल में शीत तथा उष्ण का प्रवाह उत्पन्न करता है।