ध्रुवचर्याकीर्तनं / Dhruva-caryā-kīrtana
Account of Dhruva’s Course and Related Cosmological Ordering
औषधीषु बलं धत्ते स्वधया च पिदृष्वपि / सूर्यो ऽमरेष्वप्यमृतं त्रयं त्रिषु न यच्छति
auṣadhīṣu balaṃ dhatte svadhayā ca pidṛṣvapi / sūryo 'mareṣvapyamṛtaṃ trayaṃ triṣu na yacchati
सूर्य औषधियों में बल धारण कराता है और पितरों में स्वधा के द्वारा तृप्ति देता है। देवताओं में भी अमृत का हेतु वही है; परन्तु वह इन तीनों में से किसी को भी (एक-दूसरे का) त्रय नहीं देता।