अग्निनिचयः (Agninichaya) / The Accumulation of Sacred Fire & the Classification of Pitṛs by Time-Order
ऋतुपुत्रार्त्तवाः पञ्च इति सर्गः समासतः / इत्येष बहुमानो वै प्राणिना जीवितानि च / नदीवेग इवासक्तः कालो धावति संहरन्
ṛtuputrārttavāḥ pañca iti sargaḥ samāsataḥ / ityeṣa bahumāno vai prāṇinā jīvitāni ca / nadīvega ivāsaktaḥ kālo dhāvati saṃharan
‘ऋतु-पुत्र’ और ‘आर्त्तव’ ये पाँच—संक्षेप में यही सर्ग है। इस प्रकार काल प्राणियों के जीवन को बहुत मानो सहित, नदी के वेग की भाँति आसक्त होकर दौड़ता हुआ हर लेता है।