पितृसर्ग-श्राद्धप्रश्नाः
Pitri-Origins and Shraddha Queries
अन्नं भवति वै वृष्ट्या लोकानां संभवस्ततः / आप्याययन्ति ते यस्मात्सोमं चान्नं च योगतः
annaṃ bhavati vai vṛṣṭyā lokānāṃ saṃbhavastataḥ / āpyāyayanti te yasmātsomaṃ cānnaṃ ca yogataḥ
वर्षा से ही अन्न उत्पन्न होता है; उसी से लोकों का जीवन चलता है। जो योगपूर्वक सोम और अन्न का पोषण करते हैं, वे सबको तृप्त करते हैं।