सगरस्यौर्वाश्रमगमनम्
Sagara’s Journey to Aurva’s Hermitage
एवंविधगुणेपेतो वरौ दत्तौ मया युवाम् / अभीप्सितं तु यद्यस्याः स्वेच्छया तत्प्रकीर्त्यताम्
evaṃvidhaguṇepeto varau dattau mayā yuvām / abhīpsitaṃ tu yadyasyāḥ svecchayā tatprakīrtyatām
ऐसे गुणों से युक्त वर मैंने तुम दोनों को दिए हैं। अब जिस स्त्री की जो अभिलाषा हो, वह अपनी इच्छा से उसे प्रकट करे।