Bhārgava-Charita: Rāma (Paraśurāma) Returns to Jamadagni’s Āśrama
इति श्री ब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते मध्यमाभागे तृतीय उपोद्धातपादे भार्गवचरिते त्रिचत्वारिंशत्तमो ऽध्यायः // ४३// वसिष्ठ उवाच राजन्नेवं भृगुर्विद्वान्पश्यञ्जनपदान्बहून् / समाजगाम धर्मात्माकृतव्रणसमन्वितः
iti śrī brahmāṇḍe mahāpurāṇe vāyuprokte madhyamābhāge tṛtīya upoddhātapāde bhārgavacarite tricatvāriṃśattamo 'dhyāyaḥ // 43// vasiṣṭha uvāca rājannevaṃ bhṛgurvidvānpaśyañjanapadānbahūn / samājagāma dharmātmākṛtavraṇasamanvitaḥ
इस प्रकार श्री ब्रह्माण्ड महापुराण (वायु-प्रोक्त) के मध्यम भाग के तृतीय उपोद्धातपाद में भार्गवचरित का त्रिचत्वारिंशत्तम अध्याय समाप्त हुआ। वसिष्ठ बोले—हे राजन्, इस प्रकार विद्वान भृगु अनेक जनपदों को देखते हुए, धर्मात्मा और व्रत-पालन से युक्त होकर वहाँ पहुँचे।