Reṇukā-vilāpa and the Aftermath of Jamadagni’s Slaying (अर्जुनोपाख्यान-प्रसङ्गः)
दुःखशोकपरीता हि रेणुका त्वरुदन्मुहः / त्रिःसप्तकृत्वो हस्ताभ्यामुदरं समताडयत्
duḥkhaśokaparītā hi reṇukā tvarudanmuhaḥ / triḥsaptakṛtvo hastābhyāmudaraṃ samatāḍayat
दुःख और शोक से घिरी हुई रेणुका बार-बार रोने लगीं और उन्होंने इक्कीस बार अपने हाथों से अपने पेट (छाती) को पीटा।