Śrāddha-kalpa: Amarakantaka–Tīrtha-Māhātmya and Akṣaya Pitṛ-Tarpaṇa
नियोजयति क्षेत्रज्ञं तेभ्योयोगेन योगवित् / तस्य नास्ति गतिः स्थानं व्यक्ताव्यक्ते च सर्वशः / न सन्नासन्न सदसन्नैव किञ्चिदवस्थितः
niyojayati kṣetrajñaṃ tebhyoyogena yogavit / tasya nāsti gatiḥ sthānaṃ vyaktāvyakte ca sarvaśaḥ / na sannāsanna sadasannaiva kiñcidavasthitaḥ
योग को जानने वाला योग के द्वारा उन तत्त्वों में क्षेत्रज्ञ को नियोजित करता है। उसका व्यक्त और अव्यक्त में सर्वथा न गमन है, न कोई स्थान। वह न सत् है न असत्; सत्-असत् भी नहीं—किसी अवस्था में स्थित नहीं।