Vaivasvata-Manu Sarga and the Re-Manifestation of the Saptarṣis (वैवस्वतसर्गः—सप्तर्षिप्रादुर्भावः)
हुते चाग्नौ सकृच्छुक्रे ज्वालाया निसृतः कविः / हिरण्यगर्भस्तं दृष्ट्वा ज्वालां भित्त्वा विनिर्गतम्
hute cāgnau sakṛcchukre jvālāyā nisṛtaḥ kaviḥ / hiraṇyagarbhastaṃ dṛṣṭvā jvālāṃ bhittvā vinirgatam
अग्नि में एक बार शुक्र की आहुति होते ही, ज्वाला से ‘कवि’ (ऋषि) निकल आया। हिरण्यगर्भ ने उसे ज्वाला को भेदकर बाहर आते देखा।