Vaivasvata-Manu Sarga and the Re-Manifestation of the Saptarṣis (वैवस्वतसर्गः—सप्तर्षिप्रादुर्भावः)
यस्यान्ववाये संभूतं जगत्स्थावरजङ्गमम् / मरीचिरापश्चकमे नाभिध्यायन्प्रजेप्सया
yasyānvavāye saṃbhūtaṃ jagatsthāvarajaṅgamam / marīcirāpaścakame nābhidhyāyanprajepsayā
जिसकी परम्परा से स्थावर और जङ्गम सहित यह समस्त जगत उत्पन्न हुआ, उस मरीचि ने प्रजा की इच्छा से जलों का आश्रय चाहा और ध्यान किया।