अविभागमना बुद्धिर् भावो मनसि वर्तते प्रवर्तमानस् तु रजः सत्त्वम् अप्य् अतिवर्तते //
यह ब्रह्मपुराण का पञ्चहत्तरवाँ श्लोक-स्थान है; मूल संस्कृत-पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।