यथा कूर्म इवाङ्गानि प्रसार्य संनियच्छति एवम् एवेन्द्रियग्रामं बुद्धिश्रेष्ठो नियच्छति //
यह ब्रह्मपुराण का तिरेपनवाँ श्लोक है; इसका संस्कृत मूल यहाँ उपलब्ध नहीं है।