वायोः स्पर्शो रसो ऽद्भ्यश् च ज्योतिषो रूपम् उच्यते आकाशप्रभवः शब्दो गन्धो भूमिगुणः स्मृतः //
यह ब्रह्मपुराण का इक्यावनवाँ श्लोक है; मूल श्लोक यहाँ उपलब्ध नहीं है।