चित्तप्रसादेन यतिर् जहातीह शुभाशुभम् प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखम् अत्यन्तम् अश्नुते //
यह त्रिंशत्तम श्लोक-संख्या है; मूल पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।