हिरण्यगर्भाद् ऋषिणा वसिष्ठेन समाहृतम् वसिष्ठाद् ऋषिशार्दूलो नारदो ऽवाप्तवान् इदम् //
यह 45वाँ श्लोक है, पर मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।