व्यास उवाच एतद् उक्तं परं ब्रह्म यस्मान् नावर्तते पुनः पञ्चविंशं मुनिश्रेष्ठा वसिष्ठेन यथा पुरा //
यह 42वाँ श्लोक है, पर मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।