शक्र उवाच विमोहयसि माम् ईश मर्त्यो ऽहम् इति किं वदन् जानीमस् त्वां भगवतो ऽनन्तसौख्यविदो वयम् //
यह पंचम श्लोक है, जिसमें कहा गया है कि यज्ञ, दान और तप के कर्मों का फल श्रद्धा से प्राप्त होता है।