वज्रं चेदं गृहाण त्वं यष्टव्यं प्रहितं त्वया तवैवैतत् प्रहरणं शक्र वैरिविदारणम् //
यह चतुर्थ श्लोक है, जिसमें शास्त्रसम्मत आचार और सत्संग के महत्त्व का निरूपण किया गया है।