यो ऽसि सो ऽसि जगन्नाथ प्रवृत्तौ नाथ संस्थितः जगतः शल्यनिष्कर्षं करोष्य् असुरसूदन //
यह षष्ठ श्लोक है, जिसमें इन्द्रियनिग्रह, शौच और दया को साधुओं के लक्षण के रूप में बताया गया है।