गोमूत्रभोजनश् चैव काशपुष्पाशनस् तथा शैवालभोजनश् चैव तथा चान्येन वर्तयन् //
अठारहवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है; इसका भाव पवित्र है और पुराणोक्त धर्म-तत्त्व के अनुरूप है।