The Disappearance of the Yadu Dynasty and Lord Kṛṣṇa’s Departure
बिभ्रच्चतुर्भुजं रूपं भ्राजिष्णु प्रभया स्वया । दिशो वितिमिरा: कुर्वन् विधूम इव पावक: ॥ २८ ॥ श्रीवत्साङ्कं घनश्यामं तप्तहाटकवर्चसम् । कौशेयाम्बरयुग्मेन परिवीतं सुमङ्गलम् ॥ २९ ॥ सुन्दरस्मितवक्त्राब्जं नीलकुन्तलमण्डितम् । पुण्डरीकाभिरामाक्षं स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥ ३० ॥ कटिसूत्रब्रह्मसूत्रकिरीटकटकाङ्गदै: । हारनूपुरमुद्राभि: कौस्तुभेन विराजितम् ॥ ३१ ॥ वनमालापरीताङ्गं मूर्तिमद्भिर्निजायुधै: । कृत्वोरौ दक्षिणे पादमासीनं पङ्कजारुणम् ॥ ३२ ॥
bibhrac catur-bhujaṁ rūpaṁ bhrājiṣṇu prabhayā svayā diśo vitimirāḥ kurvan vidhūma iva pāvakaḥ
भगवान् अपनी ही प्रभा से दीप्त चार-भुज रूप धारण किए थे; धूमरहित अग्नि की भाँति वे चारों दिशाओं का अंधकार हर रहे थे। उनका घनश्याम शरीर तप्त सुवर्ण-सी कान्ति से दमकता था और वक्ष पर श्रीवत्स-चिह्न शोभित था। वे रेशमी वस्त्र-युगल धारण किए, अत्यन्त मंगलमय थे। उनके कमल-मुख पर सुन्दर मुस्कान थी, नील केश लहराते थे, कमल-से नेत्र मनोहर थे और मकराकार कुण्डल चमक रहे थे। कटिबन्ध, यज्ञोपवीत, मुकुट, कटक, अंगद, हार, नूपुर तथा राजचिह्नों और कौस्तुभ-मणि से वे विभूषित थे। वनमाला से अलंकृत अंगों के चारों ओर उनके निज आयुध मूर्तिमान होकर स्थित थे; वे दाहिनी जाँघ पर बाएँ चरण को रखे, कमल-लाल तलवों सहित, आसन लगाए बैठे थे।