Atharva Veda Anuvaka 4
Kanda 610 Suktas33 Mantras

Anuvaka 4

अग्नि–इन्द्र की शक्ति से गृह और राज्य की सुरक्षा: शत्रु शक्तियों से रक्षा तथा समृद्धि, तेज (यशस्/वर्चस्) और निर्भयता का स्थिरीकरण। उपविषय: (1) गौः/पृश्नि को पौष्टिक तत्त्व मानकर विश्व-पोषण और उन्नयन। (2) रक्षोहा अग्नि—सीमा-रक्षा, सुरक्षित गमन और यज्ञीय ऊष्मा (घर्म) का संरक्षण। (3) इन्द्र—धन, विजय, राष्ट्र, यशस् और वर्चस् के दाता व रक्षक। (4) प्रत्यभिचार/प्रतिशाप और शपथ-बल (शपथ) द्वारा नैतिक-न्यायिक संरक्षण।

Suktas in Anuvaka 4

Sukta 31

यह संक्षिप्त ब्रह्माण्डीय–पौष्टिक सूक्त विश्व-गौ (गौः/पृश्नि) का आवाहन करता है—वही पोषण-तत्त्व जो माता और पिता के बीच प्राणियों की स्थापना करता है और उन्हें स्वः (दिव्य प्रकाश) की ओर ले जाता है। यह समृद्धि को ऋत-सम्यक् ब्रह्माण्डीय व्यवस्था से जोड़ता है: प्राण–अपान के द्वारा अधिपति-स्वरूप तेजस्वी शक्ति प्रकट होती है, और वाक् (पवित्र वाणी) सूर्य की गति तथा काल के मापित पड़ावों में प्रतिष्ठित रहती है। वृद्धि, गो-धन, जीवन-बल और नित्य तथा दिव्य लयों के साथ शुभ समन्वय हेतु इसका पाठ किया जाता है।

Rishi: Atharvanic tradition (cosmological hymn cluster) | Devata: Gauḥ/Pṛśni (cosmic cow; nourishing principle) | 3 Mantras

Sukta 32

अथर्ववेद 6.32 एक संक्षिप्त रक्षोहा (राक्षस-निष्कासन) सूक्त है, जो गृहाग्नि और दैवी अधिराज्य-शक्ति को अस्त्र बनाकर घर तथा उसकी सीमाओं से यातुधान, राक्षस और पिशाचों को दूर भगाता है। इसमें अग्नि द्वारा ज्वलन्त प्रत्याघात, रुद्र की देह-निष्क्रिय करने वाली शक्ति, और मित्र–वरुण की न्यायात्मक-रक्षक ऋत-व्यवस्था का संयोग है, जिससे आक्रमणकारी परिवार या उसके ‘स्थिर-स्थान’ (प्रतिष्ठा) का पता न लगा सकें; अंततः उन्हें यम के अधीन कर दिया जाता है (निष्कासन/मृत्यु)।

Rishi: Atharvanic tradition (often transmitted under Atharvan/Angiras rubric for rakṣohā hymns) | Devata: Agni (as rakṣohā, demon-burner) | 3 Mantras

Sukta 33

अथर्ववेद 6.33 इन्द्र-स्तुति का संक्षिप्त सूक्त है, जिसका प्रयोग सर्वत्र शुभ, “सुन्दर-दीखने” वाले व्यापक धन को आकर्षित करने और उस समृद्धि को दबने या छीने जाने से सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। तीन मंत्रों में यह इन्द्र के विशाल अधिकार-क्षेत्र और अजेय बल की प्रशंसा करता है, और उस दिव्य “शवः” (पराक्रम) को मानव सफलता—लाभ, सामाजिक प्रतिष्ठा, विजय और यश—में रूपान्तरित करता है।

Rishi: Atharvanic tradition (Indra-stuti; specific r̥ṣi attribution varies by anukramaṇī for this cluster) | Devata: Indra | 3 Mantras

Sukta 34

अथर्ववेद 6.34 अग्नि का एक संक्षिप्त रक्षात्मक मंत्र है, जिसमें बार-बार “दीप्त, तीक्ष्ण-ज्वाल” अग्नि से प्रार्थना की जाती है कि वह जपकर्ता को वैर-भाव और विघ्न-बाधाओं के पार उतार दे। अग्नि की स्तुति रक्षोहा (राक्षस-नाशक) तथा सर्वदर्शी रक्षक के रूप में की गई है; ‘रजस् के परे’ उसका अतिलौकिक जन्म उसे इस योग्य बनाता है कि वह प्रत्यक्ष शत्रुओं और गुप्त दुराशय—दोनों से आगे सुरक्षित मार्ग दिखाए।

Rishi: Atharvanic tradition (Agni-hymn; specific r̥ṣi attribution varies in ancillary lists) | Devata: Agni (as transcendent, obstacle-crossing protector) | 5 Mantras

Sukta 35

यह संक्षिप्त तीन-ऋचा सूक्त ‘दूर’ से वैश्वानर अग्नि को गृह/यज्ञ-परिसर में आमंत्रित करता है, उनसे प्रार्थना करता है कि वे सुगठित स्तुति के निकट आएँ और संकट (अंहस्) के क्षणों में उपस्थित होकर रक्षा करें। इसमें अग्नि को केवल रक्षक ही नहीं, बल्कि स्तोम और उक्थ के आन्तरिक संयोजक के रूप में भी देखा गया है—जिनकी सम्यक् व्यवस्था से द्युम्न (तेज), स्वः (दैवी प्रकाश) तथा अर्यमन् की स्थिर अनुकम्पा प्राप्त होती है।

Rishi: Atharvanic tradition (Agni/Vaiśvānara hymn) | Devata: Vaiśvānara Agni | 3 Mantras

Sukta 36

अथर्ववेद 6.36 में वैś्वानर-अग्नि को ऋत के प्रकाश का स्वामी मानकर पुकारा गया है। उससे अविराम घर्म (रक्षक ऊष्मा) की याचना की जाती है, जो शीत, दुर्भाग्य और यज्ञ-व्यवस्था के विघटन को दूर करे। आगे अग्नि की भूमिका गृहाग्नि से बढ़कर विश्व-नियामक के रूप में प्रकट होती है—वह सबको क्रम में रखता है, ऋत के अनुरूप ऋतुओं को सामंजस्य से प्रवाहित करता है और यज्ञ को पूर्णता तक पहुँचाता है। अंतिम मंत्र में यह शक्ति एकमात्र सार्वभौम तेज के रूप में प्रतिष्ठित होती है, जहाँ अग्नि और काम एक होकर भूत और भविष्य—दोनों पर शासन करने वाली सत्ता बनते हैं।

Rishi: Atharvanic tradition | Devata: Vaiśvānara (Agni as lord of ṛta’s light) | 3 Mantras

Sukta 37

अथर्ववेद 6.37 एक संक्षिप्त प्रतिशाप-निवारक सूक्त है, जो शपथ/शाप-शक्ति के साक्षात् रूप—सर्वदर्शी ‘शपथ’—का आह्वान करता है कि वह उस व्यक्ति का पीछा करे जिसने हानिकारक अभिचार-युक्त शापोक्ति की है। यह पीड़ित के हृदय (हृद्) और अंतःजीवन से शाप को उखाड़कर निकालता है और अग्नि व विद्युत् की अनिवार्य गति की तरह दंड-वेग को शापकर्ता पर ही लौटा देता है। अंत में अपराधी को मृत्यु (मृत्यु) के हवाले कर प्रतिघात को सील करता है और गृह/समुदाय की सुरक्षा पुनः स्थापित करता है।

Rishi: Atharvanic seer-tradition (often anonymous/Angirasic in such apotropaic hymns) | Devata: Śapatha (personified oath/curse-power) / protective all-seeing force | 3 Mantras

Sukta 38

अथर्ववेद 6.38 एक ‘वर्चस्यम्’ मन्त्र-रूप आकर्षण है, जो त्विष्/वर्चस्—व्यक्तीकृत तेज—को प्रकृति और समाज के सर्वाधिक प्रतिष्ठित तथा प्रबल केन्द्रों (हिंस्र पशु, अग्नि, सूर्य, राजकीय और युद्ध-उपकरण) से आह्वान करके बुलाता है। जहाँ-जहाँ ‘कान्ति’ पहले से निवास करती है, उन स्थानों का बार-बार नाम लेकर और देवी से ‘सामंजस्य सहित’ आने की प्रार्थना करके यह सूक्त पाठक या यजमान के भीतर करिश्मा, अधिकार और विजयी दीप्ति को अंतःस्थ करता है; और इन्द्र को उस सार्वभौम आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसे देवी ने स्वयं ‘उत्पन्न’ किया।

Rishi: Atharvanic tradition (Anukramaṇī attribution varies; commonly treated as an Atharvanic ‘varcasyam’ charm) | Devata: Tvís/Várchas as Devī (personified splendour); with Indra as generated sovereign exemplar | 4 Mantras

Sukta 39

अथर्ववेद 6.39 एक संक्षिप्त राज-समृद्धि-प्रयोग है, जो इन्द्र की विजयी प्रेरणा (इन्द्रजूत) को राष्ट्र (स्थिर प्रभुत्व), यश (लोक-प्रसिद्धि) और वर्चस् (दीप्तिमान तेज) जैसे सामाजिक कल्याणों में संकेन्द्रित करता है। तीन मंत्रों में यह यश को ऐसी वस्तु मानता है जिसे हवि की भाँति अनुष्ठानपूर्वक पोषित किया जा सकता है, और फिर उसे स्थायी, सार्वजनिक रूप से दृश्य श्रेष्ठता (ज्येष्ठता) के रूप में प्राप्त/दावा किया जाता है।

Rishi: Atharvanic tradition (Anukramaṇī attribution varies; commonly treated as a royal/prosperity prayer) | Devata: Indra | 3 Mantras

Sukta 40

यह संक्षिप्त अथर्वणीय रक्षात्मक सूक्त ग्राम और उसके जनों के चारों ओर ‘अभय’—निर्भयता का पूर्ण क्षेत्र—स्थापित करता है। इसमें द्यावा‑पृथिवी, अन्तरिक्ष, सोम, सविता और सप्तर्षि जैसे विश्व-आधारों को रक्षक रूप में आवाहन कर सुरक्षा का घेरा बाँधा जाता है। तत्पश्चात इन्द्र से प्रार्थना की जाती है कि वह समुदाय को सभी दिशाओं में ‘अशत्रु’ करे और शत्रुतापूर्ण क्रोध को बस्ती से हटाकर अन्यत्र मोड़ दे। यह सूक्त विश्व-व्यवस्था से लेकर स्थानीय सुरक्षा तक फैलने वाली एक संक्षिप्त अपोत्प्रायिक मुहर—दिग्बन्धन—के रूप में कार्य करता है।

Rishi: Atharvanic tradition | Devata: Abhaya (Fearlessness) / Dyāvāpṛthivī, Soma, Savitar, Saptarṣi as protectors | 3 Mantras

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